Pakistani Singer Nusrat Fateh Ali Khan
मुंबई की एक इमारत…
पहली मंज़िल पर मशहूर गीतकार आनंद बख्शी अपने घर में बैठे थे।
तभी उन्होंने खिड़की से बाहर देखा…
एक गाड़ी आकर रुकी।
कुछ लोग गाड़ी के पास जमा हुए…
और फिर जो नज़ारा उन्होंने देखा, उसे देखकर आनंद बख्शी की आंखों से आंसू निकल पड़े।
क्योंकि कुछ लोग एक ऐसे इंसान को सहारा देकर सीढ़ियों से ऊपर ला रहे थे…
जिसे आनंद बख्शी इतने दिनों से अपने अहंकार की वजह से मिलने नहीं जा रहे थे।
वो इंसान थे… उस्ताद नुसरत फ़तेह अली ख़ान।
और इसके बाद आनंद बख्शी ने जो किया… वो शायद इस पूरे किस्से का सबसे भावुक हिस्सा है।

ये बात 1990 के दशक की है। हिंदी सिनेमा की फ़िल्म “कच्चे धागे” के संगीत पर काम चल रहा था। फ़िल्म के संगीत की ज़िम्मेदारी पाकिस्तान से आए महान क़व्वाल और संगीतकार नुसरत फ़तेह अली ख़ान के पास थी। और गीत लिखने की ज़िम्मेदारी थी… हिंदी सिनेमा के दिग्गज गीतकार आनंद बख्शी के पास।

दोनों अपने-अपने क्षेत्र के बहुत बड़े नाम थे। लेकिन समस्या ये थी कि दोनों की मुलाक़ात ही नहीं हो पा रही थी। नुसरत साहब उस समय मुंबई के एक होटल में ठहरे हुए थे। उनकी तबीयत और शारीरिक स्थिति ऐसी थी कि उनके लिए चलना-फिरना बेहद मुश्किल था। उन्हें आने-जाने में कई लोगों की मदद लेनी पड़ती थी। उन्हें आने-जाने में कई लोगों की मदद लेनी पड़ती थी। इसलिए नुसरत साहब ने आनंद बख्शी से कहा कि अगर वो होटल आ जाएं तो दोनों आमने-सामने बैठकर गानों पर काम कर सकते हैं।
लेकिन आनंद बख्शी को ये बात कुछ और ही लगी। उन्हें लगा… “मैं उनके पास क्यों जाऊं?” उन्हें शायद ऐसा महसूस हुआ कि पाकिस्तान से आए नुसरत साहब उनसे मिलने के लिए ख़ुद क्यों नहीं आ रहे? और यहीं से एक गलतफ़हमी ने जन्म लिया।
नुसरत साहब एक धुन बनाकर भेजते… तो कभी बख्शी साहब उसमें बदलाव सुझाते। बख्शी साहब गीत लिखकर भेजते… तो कभी नुसरत साहब कहते कि शब्दों में वो एहसास नहीं आ रहा, जिसकी उन्हें तलाश है। यानी दोनों कलाकार अपने-अपने तरीके से काम को बेहतर बनाना चाहते थे। यानी दोनों कलाकार अपने-अपने तरीके से काम को बेहतर बनाना चाहते थे। लेकिन आमने-सामने बैठकर बात न होने की वजह से… काम आगे बढ़ने के बजाय अटकता चला गया।
अजय देवगन ने बाद में इस किस्से को याद करते हुए बताया कि कई दिनों तक दोनों की मुलाक़ात नहीं हो पाई। नुसरत साहब को समझ नहीं आ रहा था कि आखिर बख्शी साहब उनसे मिलने क्यों नहीं आ रहे। आख़िरकार उन्होंने तय किया… “अगर बख्शी साहब नहीं आ रहे… तो मैं ही उनके पास जाता हूं।”

अब ज़रा उस दृश्य की कल्पना कीजिए… नुसरत फ़तेह अली ख़ान, जिनका वज़न उस समय काफी बढ़ चुका था और जिन्हें चलने के लिए कई लोगों की मदद की ज़रूरत पड़ती थी… वो आनंद बख्शी से मिलने उनके घर पहुंचते हैं। बख्शी साहब मुंबई के बांद्रा में एक इमारत की पहली मंज़िल पर रहते थे। और वहां… लिफ्ट छोटी थी। नुसरत साहब को 7 से 8 लोगों की मदद से सीढ़ियों के रास्ते ऊपर ले जाया जाने लगा।
और तभी…आनंद बख्शी ने उन्हें देख लिया। उन्होंने देखा कि जिस इंसान को वो समझ रहे थे कि शायद अपने अहंकार की वजह से उन्हें होटल बुला रहा है… वो ख़ुद इतनी मुश्किल हालत में…उनसे मिलने उनके घर चला आया था।
बस… यही वो पल था। अजय देवगन के मुताबिक, आनंद बख्शी भावुक हो गए और रो पड़े। उन्होंने नुसरत साहब से माफ़ी मांगी। उन्हें एहसास हुआ कि जिस चीज़ को वो अहंकार समझ रहे थे… असल में उसके पीछे नुसरत साहब की मजबूरी थी।
कहा जाता है कि उस मुलाक़ात के बाद दोनों के बीच की गलतफ़हमी पूरी तरह खत्म हो गई। अब सवाल ये नहीं था कि… “कौन किसके पास जाएगा?” सवाल सिर्फ़ इतना था कि… “गाना कैसे अच्छा बनेगा?” और फिर दोनों ने साथ बैठकर काम किया।
नुसरत साहब संगीत पर काम करते… और आनंद बख्शी अपने शब्दों से उसमें जान डालते। जिस फ़िल्म का काम एक छोटी-सी गलतफ़हमी की वजह से रुक गया था… उसी फ़िल्म का संगीत आगे चलकर यादगार बना।
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